जन्म जयंती पर विशेष छत्तीसगढ़ की माटी से उपजा एक अनमोल हीरा थे - संत कवि पवन दीवान
- by 36Garh Mahtari News --
- 01 Jan 2026 --
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गरियाबंद@राजिम :- साक्षात् माँ सरस्वती जिनके कंठ में विराजते थे और अपने उसी कंठ से आशीर्वचन स्वरुप श्रीमद् भागवत कथा का रसपान कराते हुए एक दिन उसी परमात्म सत्ता में एकाकार हो बुंद स्वयं सागर हो गए ऐसे स्वामी अमृतानंद सरस्वती जिन्हें हम सब संत कवि पवन दीवान के रूप में जानते और पहचानते है और जिनकी आज जन्म जयंती है. छत्तीसगढ़ के उस लाल को आज पहली जनवरी को यादकर भावविभोर होने का दिन है. फक्कड़ साधू और विनोदी स्वाभाव के स्वामीजी को श्रद्धासुमन अर्पित करने का आज पावन दिवस आया है. इस सुअवसर में छत्तीसगढ़ का हर लाल आज गर्व और गौरव का अनुभव कर सकता है कि एक महामानव राजिम के पास किरवई गाँव में जन्मा था जिन्होंने भगवान राजिमलोचन की धरती राजिम को अपना कर्मभूमि बनाया और जीवन जीने की सच्ची कला को अपने जीवन से जीकर एक उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया.
आमतौर पर लोग उन्हें ठहाके लगाते और खुले बदन फक्कड़ साधू पुरुष के रूप में ही निहारते थे जबकि वे खुले बदन के साथ-साथ खुले और निर्मल मन के हिन्दू सन्यासी ज्यादा थे. लाग-लपेट और छल-प्रपंच से कोसो दूर उनका जीवन था. भगवान कृष्ण की जिस कथा से लोगो को भावविभोर करते रहे जीवन भर बस वैसा ही उनका आहार-विहार और आचरण भी बना रहा. उनके निष्कलंक जीवन में राजनीति ने उनको हर बार कलंकित किया बावजूद जहर का वे प्याला भी ठहाको के साथ निगल जाया करते थे. एक गलत फहमी राजनीति को लेकर हमेशा उनकी बनी रही कि जनता-जनार्दन की सेवा के लिए राजनीति के मंच में होना चाहिए. और उनका यह भूल कि छत्तीसगढ़ की गरीब जनता के जीवन स्तर को राजनीति के माध्यम से ऊँचा उठाया जा सकता है राजनीति के भूल-भुलैया में स्वामी जी स्वयं को खोते चले गए. वे यह भूल ही गए की राजनीति और अध्यात्म दो विपरीत ध्रूव है. अवसरवादी लोगो ने उनकी लोकप्रियता का खूब दोहन किया और अपने निहित स्वार्थ साधे यह किसी छत्तीसगढ़िया से छिपा राज नहीं है. जो भी स्वामीजी से परिचित है वे सभी इस बात से राजी जरुर होंगे ऐसा हमारा मानना है. स्वयं स्वामी जी ने राजधानी रायपुर स्थित एक कार्यक्रम में किसी अवसर पर कहा था कि राजनीति में आने से पहले उनके पास अपना कुछ था जो राजनीति में आने के बाद से खो सा गया है उनकी अंतर्मन की पीड़ा को समझने के लिए काफी था.
जनप्रतिनिधि के रूप में पहले मध्यप्रदेश और बाद में छत्तीसगढ़ राज्य के लिए वे सदैव समर्पित रहे. जनता-जनार्दन की जितनी भी प्रकार से सेवा की जा सकती थी पूरे सामर्थ्य के साथ वे तन-मन से लगे रहे. वे जानते थे की राजनीति में कभी भी सत्य मेव जयते नहीं हो सकता है. और राजनीति में आमतौर पर जहां पाखंड, झूठ और फरेब का ही बोलबाला होता है वही पर धर्मं और अध्यात्म निर्दोष और निष्कलंक जीवन का पर्याय होता है. उस बारीक़ और महीन रेखा के बीच में अंतर नहीं कर पाना सच्चे और निश्चल आत्मा के लिए कितना कठिन होता है यह कोई स्वामीजी के जीवन से सीखकर अपने को उस जाल से सुरक्षित बाहर निकाल सकता है जिसमे की आत्मोत्थान का मार्ग प्रशस्त होता हो.
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहे. इस आन्दोलन के दौरान ही उनकी भूमिका को देखकर ही जनमानस ने उन्हें पवन नहीं यह आंधी है, छत्तीसगढ़ का गाँधी है जैसे नारों से उत्साहवर्धन करते देखे गए. राज्य गठन के अंतिम दिनों में उनके इस आन्दोलन को कतिपय लोगों ने हाईजैक कर लिया बावजूद अपना प्रयास वे हर मंच और फोरम पर करते रहे. श्रेय लेने से वे कोसो दूर रहे और दूर खड़े रहकर साक्षी भाव से जो हो रहा है उसको देखते रहे. आज का राजिम कुंभ कल्प जो कभी राजिमलोचन महोत्सव के रूप में शुरुआत हुई थी उसके शिल्पकार भी वही थे. राजिम को उसके गौरव के अनुरूप विकसित करने का उनका सपना वैसे ही था जैसे कि कौशिल्या माता मंदिर निर्माण के लिए आजीवन प्रयासरत रहे थे.
संत कवि पवन दीवान जिनकी आज जयंती है उन्होंने समाज में सदैव यही सन्देश दिया की जीवन के सभी रूपों का सम्मान किया जाय और जीवन को उसकी नैसर्गिकता और स्वाभाविकता में जीया जाय. जीवन के तिरस्कार को वे महापाप समझते थे. अनेक कथा-कहानियों से सजा उनका श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का साप्ताहिक आयोजन जो ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा में ही होता था अनेक लोगो के जीवन में प्रकाश स्तम्भ के रूप में काम करता रहा. कवि ह्रदय स्वामीजी लोगो को जीवन भर गुदगुदाते रहे और स्वयं ठहाकों से नहा जाते थे. भगवान कृष्ण के विराट जीवन को बहुत ही सरलता से लोगों को समझा पाते थे इसमे छत्तीसगढ़ी भाषा का रस और आनंद समाहित होता था. स्वामीजी छत्तीसगढ़ी के साथ-साथ हिन्दी अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के प्रकांड ज्ञाता थे. काव्य पाठ के साथ प्रसिद्धी के शिखर छूने वाले स्वामीजी एक प्रखर वक्ता भी रहे. छत्तीसगढ़ को आज भी अपने इस लाल पर नाज है.
01 जनवरी 1945 को जन्मे स्वामी जी ने 02 मार्च 2016 को महाप्रयाण कर गए और ध्यान मुद्रा में समाधी को प्राप्त हुए. शासन के नुमाइंदो ने तब बहुत बड़ी-बड़ी घोषणाये कर वाहवाही प्राप्त किये थे परन्तु आज तक उस दिशा में कोई सार्थक पहल होता हुआ दिखाई नहीं पड़ता है. जीवन देवता की साधना और आराधना में जीवन को होम करने वाले स्वामीजी को आज के दिन सच्ची श्रधांजली देने का समय है. छत्तीसगढ़ की माटी के उस अनमोल रतन को पाकर यह पुण्य धरा भी धन्य हो गईं. शत-शत नमन छत्तीसगढ़ के गाँधी संत कवि पवन दीवान जी को.
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